कोमा में 13 साल, अब जीवन समर्थन से मुक्ति, माता-पिता को सुप्रीम कोर्ट से राहत

ये कहानी है ग़ाज़ियाबाद के एक नौजवान हरीश की जो पंजाब के एक विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहा था। जीवन बहुत ही खुशियों से भरा हुआ था की अचानक हरीश के जिंदगी का वह काला दिन आया और हरीश के जिन्दगी में हमेशा के लिए अंधेरा कर गया। हरीश के माँ-बाप को खबर मिली कि वह चौथी मंजिल से गिर गया है। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया । काफी इलाज करने के बावजूद हरीश सही नहीं हो पाया और वो कोमा में चला गया। सारी कोशिशों के बाद जब कुछ रास्ता नहीं सूझा तो मां-बाप ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और बेटे के लिए इच्छा मृत्यु की गुहार लगाई। एक ऐसा बेटा जिसे पाने के लिए हर माँ-बाप अनेकों जतन करते हैं। मंदिर, मस्जिद गुरुद्वारों में मिन्नते मांगते है। आज उसी बेटे के लिए माँ-बाप को मौत की दुआ करनी पड़ी और मौत है कि खुद आने को तैयार नहीं। हालाँकि दुनिया की किसी भी अदालत के लिए यह फैसला लेना हर फैसले से मुश्किल है। लेकिन हालात ऐसी कि इस मुश्किल फैसले को और ज्यादा टालने की  इजाजत नहीं देती । देश की सबसे बड़ी अदालत ने आज एक बड़ा फैसला लिया है जिसमें अशोक राणा के बेटे को इच्छा मृत्यु के लिए इजाजत दे दी गई है । दिल को झकझोर देने वाला यह फैसला देश की सबसे बड़ी अदालत ने नौजवान के मां-बाप से इजाजत लेकर दिया है । 13 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने मां-बाप को आखरी बार उनकी मर्जी पूछने के लिए कोर्ट बुलाया था । मौत की आरजू और मौत का इंतजार 11 मार्च को इस फैसले में आखिरी मोड़ लेकर आया और देश की सर्वोच्च अदालत ने इच्छा मृत्यु को मंजूरी दे दी। उम्र -ए- दराज मांग कर लाए थे चार दिन, दो आरजू में कट गए दो इंतजार में, कैसी आरजू है ये और कैसा इंतजार । आरजू थी की मौत मिल जाए और मौत 13 सालों से इंतजार करने के लिए कह रही थी। जिसे इच्छा मृत्यु मिली उनके पिता बोले  मेरा बेटा कभी पंजाब यूनिवर्सिटी का टॉपर रहा है, लेकिन अब उसकी स्थिति असाध्य और लाइलाज है। हम बच्चे को भगवान और प्रकृति की गोद में छोड़ रहे हैं। हम उसके पार्थिव शरीर को बड़े ही मान और सम्मान के साथ ले आएंगे। दुख तो बहुत है लेकिन हमारे कर्मों में जितनी सेवा लिखी थी, हम उतनी सेवा कर रहे हैं।
(बाइट पिता अशोक राणा )ये दर्द गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश के पिता अशोक राणा की है। हरीश 13 साल से कोमा में हैं। उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी दे दी । जिंदगी से तो शिकवा है ही,
मौत ने भी मुद्दतों तरसाया है।
वैसे कमाल की है ये जिंदगी और मौत का खेल । इस नौजवान के मां-बाप ने कितनी बार दुआएं मांगी कि उसके बेटे की सांसों की डोर टूट जाए लेकिन विधाता ने इसकी मंजूरी नहीं दी। अब 13 साल बाद हरीश को कोर्ट ने इच्छा मृत्यु की मंजूरी दी है।

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